Wednesday, July 7, 2010

चूड़ियां

 

बाज़ार में कल हरी चूड़ियां देख 
कैसी चमक उठीं थीं मेरी 'आँखें'

किसी ने खो दीं थीं ,बनाते वक़्त 

~Saumya

Friday, July 2, 2010

'जात'


  











बाँध कर रखो ,मासूम मन को ,
और जला कर ख़ाक कर दो पतंगों के ढेर .

हवाएं भी अब रस्ता,'जात' पूछकर देती हैं.

                                                                                                        
~Saumya

Wednesday, June 23, 2010

इस बार जब सावन...

 


















इस बार जब सावन चुपके से
मेरी खिड़की पर दस्तक देगा
तो  अँधेरे कमरों से निकल
मैं बावली सी दौड़कर
पहुँच जाउंगी छत पर |

भीगने दूँगी कुम्हलाई रूह को
बाहर से भीतर तक
भीतर से बाहर तक |

पथराई आँखों को
नम होने दूंगी
पराये अश्कों से ही सही |

इन्द्रधनुष से कुछ रंग उधार लेकर,
रंग लूँगी 
बेरंग हुए सपनों को |

थकी हुई साँसों को
फिर ताज़ा कर लूँगी
धरती की सौंधी  महक से |

बरखा की रिमझिम को धीमे से गुनगुनाउंगी,
हवाओं की ओढनी ले,हौले से झूम जाउंगी,
और फिर खुशदिल होकर
जब दोनों हाथों को आगे फैलाउंगी
तो चंद बूँदें
मेरी हथेलियों पर आकर ठहर जायेंगी
और हर बार की तरह इस बार भी
कुछ नया लिखेंगी
कुछ अलग  ....
इस बारी ,शायद कुछ अच्छा ! :)

~Saumya

Sunday, June 20, 2010

बारिश होने को है...














वादियाँ सजदे में हैं ,
आफताब परदे में है,
पंछियों में हलचल सी है,
फिजायें भी मलमल सी हैं.
कि दूर बादलों के गाँव से
कोई आने को है |

रिमझिम-रिमझिम,
कुछ मनचली बूँदें ,
रिमझिम-रिमझिम,
कुछ सपनों की फुहारें,
कि गुलशन-ए -ज़िन्दगी 
फिर मुस्कुराने को है ...

दूर बादलों के गाँव से
कोई आने को है ...

~Saumya.

Monday, June 7, 2010

ज़िन्दगी...


















'दिल' और 'दिमाग' में उलझनें बढ़ गयीं थीं,
साँसों की डोर में भी गिरहें पड़ गयीं थीं
आज बैठकर सुलझाया है सब कुछ
ऐ ज़िन्दगी तू हमें रास आने लगी है!

माथे पर कुछ सिलवटें बेहद फिजूल थीं,
पलकों की छाँव में सिर्फ यादों की धूल थी 
आज बैठकर मिटाया है सब कुछ
ऐ ज़िन्दगी तू हमें लुभाने लगी है!

हाथ की लकीरों पर वक़्त की खरोंचे थीं,
लबों पर मुसकुराहट भी ज़ख्म सरीखी थीं 
आज 'उम्मीद' का मरहम लगाया है सब पर
ऐ ज़िन्दगी तू हमें अपनाने लगी है!

ऐ ज़िन्दगी तू हमें रास आने लगी है!

~Saumya

गिरहें=knot,खरोंचे=scratches


Friday, June 4, 2010

गम



तारों संग कल गुफ्तगू में हमने
कुछ एक गम जाहिर किये थे

सुना है पूरी रात बारिश हुई है| 

~Saumya 


गुफ्तगू=conversation,जाहिर=express


Monday, March 29, 2010

इस पार उस पार.....














मेरे मिट्टी के खिलौनों से 
उस पार की मिट्टी की भी
महक आती है
तो क्या तोड़ दोगे तुम
मेरे सारे खिलौने ?

मेरी  पतंग
जब  कभी  उड़ कर
उस पार जायेगी 
और क्षितिज के शिखर को
छूना चाहेगी
तो क्या फाड़  दोगे तुम
मेरे रंगीन सपनों  को  ? 
या फिर काट दोगे-
मेरे ही हाथ?

कुछ बोलो......
क्या करोगे तुम?

उस पार से जब  कभी पंछी
मेरी बगिया में
गीत गाने आयेंगे
तो क्या रोक दोगे तुम
उनकी उड़ान ?
या उजाड़ दोगे
मेरी ही बगिया?

जब कभी उस पार के
गुलाबों की खुशबू
मेरी साँसों में
घुल जाया करेगी 
तो क्या थाम लोगे तुम
चंचल हवाओं को ?
या तोड़ दोगे
मेरी साँसों की
नाजुक सी डोर?

उस पार से चल कर
चंद ख्वाब
जब मेरी पलकों में पनाह लेने आयेंगे
तो क्या रोक दोगे तुम
उनका रास्ता?
या छीन लोगे मुझसे
मेरी ही आँखें?

कुछ बोलो......
क्या करोगे तुम?
कुछ तो बोलो .....

इस पार
उस पार 
उस पार
इस पार
दीवारें खड़ी करने के लिए
और कितने घर उजाड़ोगे तुम?
कितनों की मांगों का सिन्दूर मिटाओगे ?
कितनों की आँखों का दीप  बुझाओगे ?
सुर्ख लाल ईटों पर
और कितने खून चढाओगे  तुम ?
बोलो....
कुछ तो बोलो ....

इन  दीवारों को लम्बी करने के लिए
और कितनी ईंट जुटाओगे  तुम?
जो कम पड़ी, तो क्या दिलों को भी  निकाल कर
दीवारों पर चुन्वाओगे तुम?
बोलो .....

'माँ' को टुकडो में बिखेर  दिया तुमने
क्या अब आसमां को भी बंटवाओगे तुम?

कुछ बोलो......
कुछ तो बोलो?

प्रश्न शिथिल है
उत्तर भी
बस एक डर है -
कि ईंटों की गिनती इतनी जियादा ना हो जाए
कि वो अपने ही बोझ  तले ढह  जाएं
और मलबे में दबे
मुझे तुम दिखो
कराहते  हुए .....
पछताते हुए......
सिर्फ तुम ........


~Saumya