कल चाँद फलक पर पूरा था
वैसा ही ....छैल -छबीला आवारा
पहले तो बादलों के परदे में छिप -छिप कर
तंग करता रहा मुझे
फिर थक कर आकर बैठ गया बेहया
खिड़की पर मेरी !
सारी रात
बिना पलक झपकाय
एकटक........निहारती रही उसे मैं
मानो चाँद ना हो
तुम्हारी ही कोई पुरानी
मुस्कुराती हुई....तस्वीर हो....... :)