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Wednesday, June 13, 2012

आँखों से थोड़ी बारिश हो..











सूखे हुए बेजान ख्वाब सारे
दफन हैं रूह की..... कमज़ोर बुनियाद पर 
......................................................
आँखों से थोड़ी बारिश  हो
तो दिल को यकीं आये
कि पल्कों की डाली पर
इक नया ख्वाब 
फिर 'हरा' होगा कभी.....................

~Saumya

Monday, December 26, 2011

तुम और मैं














सिरफिरे बादल से तुम
आवारा…..आज़ाद…शिखर के नज़दीक……
आकाश के आँगन में उमड़ते-घुमड़ते
रंगों की नयी-नयी छठा बिखेरते ……….
धूप की तपिश में हर रोज़ निखरते
एकदम बच्चों जैसे….मासूम .....
चाँद -तारों संग लुका -छिपी खेलते
हवाओं संग होड़ लगाते
कभी परिंदों की टोलियों को कहानियाँ सुनाते
और कभी ना जाने कहाँ गुम हो जाते …………
पागल ….बिल्कुल पागल हो तुम !
उड़नखटोले पर अपने जब सैर पर निकलते हो
सज-सँवर के………नारंगी, कभी नीली , कभी बैंगनी पोशाकों में
कितना इतराते फिरते हो …..उफ़……..ये अदाएं तुम्हारी !
जब कभी नाराज़ होते हो ना …..तो तुम्हारे गुस्से की धमक
धडकनें बढ़ा देती है….सच्ची !
पर वादियों की गोद में सिर रखकर ….फुर्सत में कभी
जब खुशियों के छोटे छोटे मोती छलकाते हो
तो पूरी कायनात मानो जश्न में सराबोर हो जाती है
धरती सँवर जाती है ….नयी नवेली दुल्हन की तरह !
संगीत मीठे …रंग और गहरे हो जाते हैं
दिल के बंद किवाड़ आप ही खुल जाते हैं ……..
ना जाने क्या बात है तुममे ………..
परियों के सपनों से लगते हो
फिर भी अपने से लगते हो ……..

और बावली नदी सी मैं
कभी फूलों जैसी शांत ….
कभी तितलियों जैसी चँचल….
जड़ों से जुड़ी ......
सीमाओं में बंधी …
अपनी राहें खुद बनाती
झूमती …गाती ….बलखाती ….
बस बहती जाती …बहती जाती …!
रेशमी किरणों संग अठखेलियाँ करती
झुरमुठों में गुलशन संग घंटों बतियाती
कभी रेत के दानों पर कविता लिख आती
एकदम बच्चों जैसी….मासूम .....
कभी बेवजह ही जोर से खिलखिला कर हंस देती
कभी तारों- जड़ी ओढ़नी  पहन इतरा कर चल देती
और कभी तुम्हारे बारे में सोचते- सोचते
थोड़ा शर्माकर ...थोड़ा इठलाकर …खुद में सिमट जाती ….
कभी झील की सिलवटों सी सुलझी हुई सी
कभी अपनी ही लहरों में उलझी हुई सी
कभी  बिछड़े किनारों  को  जोड़ती  तो  कभी
अपनी  ही  गहराईयों  में  खोयी  हुई  सी ….
पता है अक्सर छिप-छिपाकर
वो चाँद का टुकड़ा...... मुझमे उतर आता है ……
फिर सारी रात हम तुम्हारी ही बातें करते हैं …..

कितने  अलग  से  हैं ना ….मैं  और  तुम …
फिर  भी  कितने  एक  जैसे ….तुम  और  मैं
अनजाने  हैं  एक  दूजे  से
मिलेंगे  अचानक.....  कहीं किसी  अनजाने  से  मोड़  पर
शायद  फूलों  की  उन्ही  वादियों  के  बीच
जहाँ  मिलता  है  एक  सिरफिरा  बदल ….एक  बावली  नदी  से ……
ज़िन्दगी  मसरूफ़   है  अभी  उस  राह  को  संवारने  में
ये  इंतज़ार  तब  तक  अच्छा  लगता  है ….
है  ना ……!

~Saumya

Thursday, January 27, 2011

सपना तुम्हारा...... जो सच हो जाएगा....



















स्पर्श तुम्हारा...जब उसे...छूकर निकल जाएगा,
फ़ीका नीला आसमां वो .......सतरंगी हो जाएगा 
तुम्हारी परछाईं की ओट में आकर 
धूमिल सा तारा वो...और दमक जाएगा!

काबिलियत तुम्हारी जब तुम्हें....कामयाबी दे जायेगी 
भीगी भीगी पलकों में.....ज़िन्दगी मुस्कुरायेगी!
तुम्हारी नज़रों की छाँव तले आकर
तिनका तिनका ये धरती.... और संवर जायेगी!

खुश होकर जब तुम....गीत कोई गुनगुनाओगी 
फिजाओं को भी संग अपने...... थिरकता हुआ पाओगी
तुम्हारी साँसों के तार जो यूँ  छिङ जायेंगे
ये गुल ये गुलशन...... और महक जायेंगे !


सपना तुम्हारा...... जो सच हो जाएगा
खुदा को भी खुद पर..... फक्र हो जाएगा 
तुम्हे यूँ हँसता- मुस्कुराता देख 
ये वक़्त भी कुछ देर......यूँही ठहर जाएगा !

सुनो.....वो जो दुआओं की पोटली है....उसे संभाल कर रखना
तुम अपनी मेहनत और लगन को.... बना कर रखना
हर सपना तुम्हारे सपने की ही इबादत करता है
सुनो...तुम बस उम्मीद की लौ....जला कर रखना !


Saumya

Wednesday, June 23, 2010

इस बार जब सावन...

 


















इस बार जब सावन चुपके से
मेरी खिड़की पर दस्तक देगा
तो  अँधेरे कमरों से निकल
मैं बावली सी दौड़कर
पहुँच जाउंगी छत पर |

भीगने दूँगी कुम्हलाई रूह को
बाहर से भीतर तक
भीतर से बाहर तक |

पथराई आँखों को
नम होने दूंगी
पराये अश्कों से ही सही |

इन्द्रधनुष से कुछ रंग उधार लेकर,
रंग लूँगी 
बेरंग हुए सपनों को |

थकी हुई साँसों को
फिर ताज़ा कर लूँगी
धरती की सौंधी  महक से |

बरखा की रिमझिम को धीमे से गुनगुनाउंगी,
हवाओं की ओढनी ले,हौले से झूम जाउंगी,
और फिर खुशदिल होकर
जब दोनों हाथों को आगे फैलाउंगी
तो चंद बूँदें
मेरी हथेलियों पर आकर ठहर जायेंगी
और हर बार की तरह इस बार भी
कुछ नया लिखेंगी
कुछ अलग  ....
इस बारी ,शायद कुछ अच्छा ! :)

~Saumya

Sunday, June 20, 2010

बारिश होने को है...














वादियाँ सजदे में हैं ,
आफताब परदे में है,
पंछियों में हलचल सी है,
फिजायें भी मलमल सी हैं.
कि दूर बादलों के गाँव से
कोई आने को है |

रिमझिम-रिमझिम,
कुछ मनचली बूँदें ,
रिमझिम-रिमझिम,
कुछ सपनों की फुहारें,
कि गुलशन-ए -ज़िन्दगी 
फिर मुस्कुराने को है ...

दूर बादलों के गाँव से
कोई आने को है ...

~Saumya.

Monday, June 7, 2010

ज़िन्दगी...


















'दिल' और 'दिमाग' में उलझनें बढ़ गयीं थीं,
साँसों की डोर में भी गिरहें पड़ गयीं थीं
आज बैठकर सुलझाया है सब कुछ
ऐ ज़िन्दगी तू हमें रास आने लगी है!

माथे पर कुछ सिलवटें बेहद फिजूल थीं,
पलकों की छाँव में सिर्फ यादों की धूल थी 
आज बैठकर मिटाया है सब कुछ
ऐ ज़िन्दगी तू हमें लुभाने लगी है!

हाथ की लकीरों पर वक़्त की खरोंचे थीं,
लबों पर मुसकुराहट भी ज़ख्म सरीखी थीं 
आज 'उम्मीद' का मरहम लगाया है सब पर
ऐ ज़िन्दगी तू हमें अपनाने लगी है!

ऐ ज़िन्दगी तू हमें रास आने लगी है!

~Saumya

गिरहें=knot,खरोंचे=scratches


Monday, January 11, 2010

सहर

















धुंध का घूंघट उठाती
सांवली सी सहर
इठलाती ,मुस्कुराती,
और बादलों की ओट से झांकता
ठिठुरता,अलसाता सूरज.....|
अंगड़ाईयां लेते झील और पोखर
और उन पर मचलती किरणों संग
अठखेलियाँ करती
वादियों की परछाईयाँ .....|
फूलों से अलंकृत पीरोजी चोली
और गुलाबी हवाओं की रेशमी ओढ़नी में   
सँवरती  वसुंधरा.....
शर्माती,सिहरती .....
खुद में सिमटती जाती ....|
साँसों में जब घुलती
हरसिंगार की महक
तो मानो ज़िन्दगी को जीने की
एक और वजह मिल जाती |
पतझड़ के शुष्क पत्तों से
फिर उभरता संगीत
ठूंठे अमलतास पर
पुनः पाखियों के नव गीत |
सीतकारती बासंती बयार
जब मीठी सी गुनगुनी धुप में
उड़ा ले जाती संग धूलिकणों  को
तो सहसा दीख पड़ती
झुरमुठों से झांकती वल्लरियाँ ,
पत्थरों के अंतराल में अंकुरित 
कोपलों की लड़ियाँ |
और ओस की चंद बूंदों के संग
पंखुड़ियों के आँचल में सहेजी हुईं 
अश्रुओं की तमाम सीपियाँ
कुछ गगन की,कुछ धरा की ,कुछ मेरी
जो बरबस ही छलक आयीं थीं
जीवन को फिर पनपता  देख.............|

~Saumya

Monday, June 29, 2009

उम्मीद ..















सूरज कब ढलेगा ,
इंतज़ार में देखो सांझ खड़ी है,
फिकर न करो मुसाफिर,
इन अंधेरों में भी रौशनी तमाम पड़ी है।

~सौम्या 

Saturday, June 27, 2009

मकड़ी का मर्म...














अपना आगार सँवारने के लिए,
तुम मेरा आशियाना क्यूँ तोड़ती हो?
कल्प-कल्प से हर कण जुटाती मैं,
तुम पल भर में ही उधेड़ देती हो।
क्यूँ,क्यूँ करती हो तुम ऐसा ?
क्या कृत्य तुम्हारा नही यह नृशंस जैसा?

प्रश्न यह कुछ अप्रत्याशित था,
इक मूक के मर्म का साक्षी था।
मैंने उत्तर दिया,
मैं तो मात्र अपना घर बुहारती हूँ,
दीवारों से लिपटे जालों को हटाती हूँ।

प्रतिउत्तर मिला की तुम,
दृग में लगे जालों को,
दिल में लगे जालों को,
क्यूँ नही हटाती ?
क्यूँ नही मिटाती ?

मैंने तो तुम्हारे आलय को देवालय सा जाना था ,
नगण्य से उस कोने को,अपना संसार माना था।
न पता था तुम्हारे दिल की दीवारें इस कदर कमजोर हैं ,
कि मेरे आशियाने का भार सह ना पाएँगी,
संकीर्णता तुम्हारे मन की इतनी पुरजोर है,
कि अनिकेतन को सहारा कभी दे ही ना पाएँगी।

मैं नीरव निस्पंद सी देखती रही,
अपनी अनभिज्ञता को कोसती रही।

मकड़ी ने कहा......
जाओ अपनी सीरत को सवारों,
अपने अंतरतम को बुहारो,
पाथय प्रेम का स्वीकारो,
फिर क्या पता ,
मैं अपना ठिकाना बदल लूँ,
कहीं किसी ऐसे महल में जहाँ,
दृगों में जाले अभी भी लगे हुए हैं.......
दिलों में जाले अभी भी लगे हुए हैं.......

आज मैं फिर से जाले हटा रही हूँ...
फर्क इतना है की जगह बदल गई है………

मायने बदल गए हैं.......

~सौम्या 

Friday, May 22, 2009

मंजिल का सफर....


है फलक को जिद अगर,
बिजलियाँ गिराने की,
तो है हमें भी जिद ,
वहीं आशियाँ बनाने की ,
अश्क आंखों में आए जाते हैं ,
फिर भी हम मुस्कुराए जाते हैं।
गुलशन की आबरू के लिए ,
आशियाँ ख़ुद ही लुटाये जाते हैं।


है सूरज को जिद अगर,
आग बरसाने की ,
तो है हमें भी जिद ,
तपिश में रूह सुलगाने की ,
पसीने चेहरे पर आए जाते हैं ,
कदम,हर कदम हम बढाये जाते हैं।
सूरज की आबरू के लिए,
देह ख़ुद की ही जलाए जाते हैं।


है लहरों को जिद अगर,
किनारों से टकराने की,
तो है हमें भी जिद ,
समंदर पार जाने की ,
आंधी-तूफ़ान आए जाते हैं,
कश्ती हम अपनी बढाये जाते हैं
लहरों की आबरू के लिए,
डुबकियां समंदर में लगाए जाते हैं।


है नियति को जिद अगर,
राह हमारी रोकने की,
तो है हमें भी जिद ,
हर चट्टान तोड़ने की,
अंगारे पाँव को जलाए जाते हैं ,
हर सितम दिल में हम दबाये जातें है।
नियति की आबरू के लिए,
दोस्ती काँटों से निभाए जाते हैं।


गर जानना चाहते हो मेरी उड़ान,
मेरी मंजिल ,मेरे अरमान,
तो ऊंचा करो,ऊंचा करो उस आसमान को,
लहरों के उफान को ,
बढ़ा दो सूरज की गर्मी,
मिटा दो भाग्य की नरमी,
शायद मेरी उड़ान तुम देख पाओगे,
फिर भी मेरा गंतव्य ना तुम भेद पाओगे।

अभी तो सफर का इरादा किया है,
ख़ुद से ही लड़ने का वादा किया है,
अरसों बाद आंखों ने यह हौसला दिखाया है,
जिंदगी ने आज हमें मरना सिखाया है!!!

~सौम्या