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Sunday, June 10, 2012

ये ज़िन्दगी क्यूँ .…फिर भी अच्छी लगती है ?




बात  बात  पर  देखो  ना …हर  पल   झगड़ती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ .....…फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

कभी  बिना  गुनाह  किये  ही ..............…सज़ा  सुनाती  है 
  मासूम  किसी  गुड़िया को .......... बेवजह  रुलाती  है 
हर  साँस में  रूह ….......... कितनी  बार  बिलखती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ  ........…फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

कभी  सपने  दिखाकर …............सपने  तोड़  देती  है 
  हवाओं  का  रुख   ही............  उल्टा  मोड़  देती  है 
उठ  कर  गिरना .…कभी  गिर  कर  उठना….लुढ़कती -संभलती है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ  ……………..फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

जिसे  शिद्दत  से  चाहो ….........…वो  कहाँ  बक्श्ती है 
जो  दुआओं  में  मांगो  .........…वो  कहाँ  सुनती  है 
दिल  की  प्यारी  बातों को ......…ये  कहाँ  समझती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ ……………. फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

हँसाती  है.......रुलाती  है......बनाती  है.......मिटाती  है
सिखाती  है.........दुलराती  है.......गिराती  है.........भगाती  है
हाथ  की  रेखाओं  पर  बस..............चलती  जाती  है.....

इस  कोने  कभी.........कभी  उस  कोने  सिसकती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ...............फिर  भी  अच्छी  लगती  है? 

~Saumya

Friday, February 18, 2011

एक छोटा सा ख्वाब
















वक़्त की रफ़्तार से कहीं आगे
आकाश की परिधि से कहीं दूर
एक छोटा सा नाजुक सा ख्वाब
सहेज कर रखा है मैंने 
खुदा से भी छुपाकर !
रोज़ सँवारती हूँ उसे  
आहिस्ता-आहिस्ता
अपनी 'सोच' के आँचल में
कल्पना की सीपियों से!

पता है
रोज़ सवेरे-सवेरे 
सूरज की पहली किरण से पहले 
ये ख्वाब
नींदों में आ जाता है
और 'दिन'
अच्छा गुजर जाता है !
हकीकत और ख्वाब का 
ये साँझा रिश्ता देख
'जिंदगी' भी हौले से
मुस्कुरा देती है!
(शायद मेरी मासूमियत पर!)
  
काश की कुछएक ऐसे ही ख्वाब 
कभी सच ना हों 
और खूबसूरती-ऐ-जिंदगानी 
यूँही बनी रहे!

~Saumya