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Saturday, August 29, 2009

मौत फिर दबे पाँव आ गई ......











उगते हुए सूरज में सांझ ला गई,
लो मौत फिर दबे पाँव आ गई।
कभी जवानी में नाकामी के नाम आ गई,
कभी त्तन्हायियों में यूँही गुमनाम आ गई,
लो मौत फिर दबे पाँव आ गई।
किसी के अबसारों का चिराग बुझा गई,
किसी के घर की ,बुनियाद हिला गई,
जिसने आंखों से खुशियों को छलकाया,
उसी के आशियाने में सैलाब ला गयी
लो मौत फिर दबे पाँव आ गई।
सपनों की सेज पर मय्यत सजा गई,
किसी के अरमानों को फिर ढहा गई,
बड़ी बेआबरू हो बेवक़्त ही अंजाम ला गई,
ये मौत फिर दबे पाँव आ गई।
किसी को यहाँ यातीम कर,
किसी को वहाँ तन्हा छोड़ आयी,
अधूरे वायदों के बोझ तले,
इक बिलखती रूह , रुखसत हो आयी।
माना की मौत आखिरी अफसार है…
पर ज़िन्दगी को भी तो बेनजीर जीने की दरकार है
फिर क्यूँ ज़िन्दगी को हरा ये अहजान ला गई,
ऐसी भी क्या आफत ,की इखतियाम ढा गई,
मौत क्यूँ नंगे पाँव आ गई……।
किसी को निगल,किसी की भूख मिटा गई,
कातिब के दिल-ओ-दिमाग में इज़तिरार ला गई,
आंखों को वो लुटा हुआ मंजर दिखा गई…
मौत फिर दबे पाँव आ गई…......
ये क्यूँ फिर दबे पाँव आ गई……

~ सौम्या
 

अबसार=eyes ;यातीम =orphan ;अफसार =ultimate destination ;बेनजीर =in a unique way ;अहजान=sorrows;
इखतियाम=end ;कातिब =writer ;इज़तिरार =helplessness/agitation