Showing posts with label Conscience stricken. Show all posts
Showing posts with label Conscience stricken. Show all posts

Sunday, September 19, 2010

ए खुदा ,तू खैरियत से तो है?












तेरे  नाम  पर  इक  मस्जिद  गिरती  है
तेरे  नाम  पर  इक  मन्दिर  बनता  है
तेरे  नाम  पर  ऐ  ज़िन्दगी  के दाता  
मौत  का  बर्बर  खेल  चलता  है |

तू  रिश्ते  जोड़ता  है
लोग  दिल  तोड़  देते  हैं
तू  प्यार  सिखाता  है
लोग  नफरत  घोल  देते  हैं |

तू  निराकार  है
तेरे  अक्स  पर  झगडे  होते  हैं
तू  पालनहार  है
लोग  तुझे  ही  तोल  देते  हैं |

तेरे  नाम  पर  बाती  जलती  है
तेरे  नाम  पर  घाटी  सुलगती  है
तेरे  नाम  पर  बनी  रिवायतों  पर
अक्सर  ही  रूह  बिलखती  है |

दर्द  होता  होगा  तुम्हें ,देखकर  यह  सब
आँखें  नम  हो  जाती  होंगी  अक्सर  तुम्हारी
ए खुदा  ,तू  खैरियत  से  तो  है ?
तेरी सलामती की दुआ अब मैं किस्से मांगूँ?

~Saumya

Friday, August 13, 2010

क्या गलत है?


















क्या गलत है जो बिरजू घर-घर भीख मांगता है.
जब भूख लगती है ,तो  दिल बिलखता  है.                                       
महंगाई की मार में, सिर्फ बचपन बिकता है
क्या गलत है जो वो  मासूम ,यूँ दर-दर फिरता है |

क्या गलत है जो अब्दुल चोरी करता है
गरीबी की आग में ईमान झुलसता है
बहन हुई है तीस की ,बाप दहेज़ के लिए फिरता है
क्या गलत है जो अब्दुल चोरी करता है |

क्या गलत है जो कश्मीर में बच्चा ,बन्दूक उठाता है
तो क्या हुआ,कि गोलियों की आवाज़ से वो डर-डर जाता है.
वो नन्हा परिंदा अपने घर में आज़ादी चाहता है
क्या गलत है जो उसकी आँखों में ,खून उतर आता है |

क्या गलत है जो अफज़ल आतंक फैलाता है
मासूम इक दिल पत्थर बन जाता है.
है कौन वो जो उसकी 'आत्मा' मरवाता है
अफज़ल की क्या गलती , वो 'आतंक' फैलाता है |

क्या गलत है कि इक माँ ,बेटी का गला दबाती है
जमाने के दस्तूरों पर,उसकी चिता जलाती है
समाज उन्हें वैसे भी जीने ना देगा
बोलो,क्या गलत है.........................

गलत ये नहीं हैं
गलत वो हैं जो सत्ता पाने के बाद,कर्त्तव्य भूल जाते हैं
गलत वो हैं जो सिर्फ,अपना स्वार्थ साधते हैं|
गलत वो हैं जो निर्दोषों का शोषण करते हैं,
गलत वो हैं जो कुरीतियों का पोषण करते हैं|
गलत कहीं न कहीं,हालात भी हैं
गलत थोड़े हम, थोड़े आप भी हैं!!!

~Saumya

Monday, March 29, 2010

इस पार उस पार.....














मेरे मिट्टी के खिलौनों से 
उस पार की मिट्टी की भी
महक आती है
तो क्या तोड़ दोगे तुम
मेरे सारे खिलौने ?

मेरी  पतंग
जब  कभी  उड़ कर
उस पार जायेगी 
और क्षितिज के शिखर को
छूना चाहेगी
तो क्या फाड़  दोगे तुम
मेरे रंगीन सपनों  को  ? 
या फिर काट दोगे-
मेरे ही हाथ?

कुछ बोलो......
क्या करोगे तुम?

उस पार से जब  कभी पंछी
मेरी बगिया में
गीत गाने आयेंगे
तो क्या रोक दोगे तुम
उनकी उड़ान ?
या उजाड़ दोगे
मेरी ही बगिया?

जब कभी उस पार के
गुलाबों की खुशबू
मेरी साँसों में
घुल जाया करेगी 
तो क्या थाम लोगे तुम
चंचल हवाओं को ?
या तोड़ दोगे
मेरी साँसों की
नाजुक सी डोर?

उस पार से चल कर
चंद ख्वाब
जब मेरी पलकों में पनाह लेने आयेंगे
तो क्या रोक दोगे तुम
उनका रास्ता?
या छीन लोगे मुझसे
मेरी ही आँखें?

कुछ बोलो......
क्या करोगे तुम?
कुछ तो बोलो .....

इस पार
उस पार 
उस पार
इस पार
दीवारें खड़ी करने के लिए
और कितने घर उजाड़ोगे तुम?
कितनों की मांगों का सिन्दूर मिटाओगे ?
कितनों की आँखों का दीप  बुझाओगे ?
सुर्ख लाल ईटों पर
और कितने खून चढाओगे  तुम ?
बोलो....
कुछ तो बोलो ....

इन  दीवारों को लम्बी करने के लिए
और कितनी ईंट जुटाओगे  तुम?
जो कम पड़ी, तो क्या दिलों को भी  निकाल कर
दीवारों पर चुन्वाओगे तुम?
बोलो .....

'माँ' को टुकडो में बिखेर  दिया तुमने
क्या अब आसमां को भी बंटवाओगे तुम?

कुछ बोलो......
कुछ तो बोलो?

प्रश्न शिथिल है
उत्तर भी
बस एक डर है -
कि ईंटों की गिनती इतनी जियादा ना हो जाए
कि वो अपने ही बोझ  तले ढह  जाएं
और मलबे में दबे
मुझे तुम दिखो
कराहते  हुए .....
पछताते हुए......
सिर्फ तुम ........


~Saumya

Friday, December 18, 2009

नसीब ...













उन्सठ साल पुरानी चप्पलें
आज फिर काम पर जा रही हैं
घिस कर हो चुकी हैं कागज़ सरीखी
पर लिहाज़ करती हैं 'पहनने वाले का' |

पिताजी ने आज तय किया है
दो रोज़ दोपहर का खाना नहीं खायेंगे
चालीस रूपए कम हैं
बिटिया को जन्मदिन पर साइकिल दिलानी है |

माँ ने आज हलवा बनाया था
सबका हिस्सा लगाया
उसके हिस्से सिर्फ सौंधी खुशबू ही आ पाई
वो फिर खुद को गिनना भूल गयी थी |

दादी को आज पेंशन मिली थी
पोते को दे दी - कपडे बनवाने को
आधे दादी की दवाई में खर्च हो गए
बाकी में जीजी की ओढनी ही आ पाई|

आज छप्पर पर सावन भी जमकर थिरका
वो बेतरतीब बस्ती फिर बेदाग़  हो गयी
मुन्ना की पतंग देखो आसमां छु रही है
वो इन्द्रधनुष कैसा फीका जान पड़ता है |


इस बस्ती में मकान कच्चे पर दिल सच्चे हुआ करते हैं
बड़े तो बड़े ,बच्चे भी 'बड़े' हुआ करते हैं
दिन की आखिरी धुप भी जब दरवाज़े पर दस्तक देती  है
उसकी खुशामदीद में 'दिए' जला करते हैं |

सच कहूं तो इन ज़मीन पर सोने वालों के सपने
बिस्तर पर करवट बदलने वालों से
जियादा खूबसूरत होते हैं
पर तमन्नाएं हैं की नसीब का लिहाज़ कर जाती हैं.......


~सौम्या

Friday, October 23, 2009

गरबीली गरीबी.................





लबे सड़क पर सजती है
गरबीली गरीबी की                                          
एक कराहती हुई तस्वीर
अपनी किस्मत पर बिलखती
एक फूटी हुई तकदीर .........

छप्परों पर यहाँ सावन नहीं थिरकते ,
ना ही गुज़रती है वो बावली बयार ,
दिन का सूरज तो कभी था ही नहीं इनका ,
चांदनी ले जाती है इनसे अँधेरे उधार.

ज़िन्दगी यहाँ इम्तेहां नहीं लेती..
इम्तेहां ही ज़िन्दगी ले लेते हैं
पलकें कभी ख्वाब नहीं पिरोतीं 
हकीकत छीन लेती है ये हक ......
दीख पड़ती है तो बडों की आँखों में तैरती बेबसी ,
छोटों की आँखों में सिसकते सवाल ...............

ठंडी पड़ी अंगीठी कि राख 
सुलगा देती है ग़मों की आंच को,
उबाल देती है अश्कों के सैलाब को                                                 
कि आतें कुम्हला जाती होंगी...
पेट में भड़की आग से................

यहाँ  तार सांसों के तब जुड़ते हैं ,
जब कूडों में से निवाले मिलते हैं                                                    
ये तिनका-तिनका मरते हैं,
तब ज़र्रा -ज़र्रा जीते हैं............

फिर भी तुम  नज़रें फेर लेते हो....                                             
आह! रूह छलनी हो जाती होगी
तुम्हारी उदासीनता दिल को 
चूर चूर कर जाती होगी ............

ये दर्द तो फिर भी सह लेते होंगे 
अपनी किस्मत पर रो लेते होंगे 
पर रूखी सूखी रोटी जब दिन बाद,
हलक के पार उतरती होगी,
हाय कुम्हलाई आतों को,
किस कदर न जाने चुभती होगी......
किस कदर न जाने चुभती होगी......

पर तंज़ ये नहीं है                                                                     
कि ये तस्वीर नाखुश  है 
तंज़ ये है
कि ऐसी ही तस्वीर तुम 
कागज़ पर उतारते हो 
फिर कीमत चुकाकर 
घरों में सजाते हो.......
खुशकिस्मत है ये तस्वीर 
जिसे सिरजनहार मिला ,
बदकिस्मत थी वो..........
जिसे कोई न पालनहार मिला......
कोई ना पालनहार मिला............
कोई ना ................................

~सौम्या