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Wednesday, June 13, 2012

आँखों से थोड़ी बारिश हो..











सूखे हुए बेजान ख्वाब सारे
दफन हैं रूह की..... कमज़ोर बुनियाद पर 
......................................................
आँखों से थोड़ी बारिश  हो
तो दिल को यकीं आये
कि पल्कों की डाली पर
इक नया ख्वाब 
फिर 'हरा' होगा कभी.....................

~Saumya

Friday, February 18, 2011

एक छोटा सा ख्वाब
















वक़्त की रफ़्तार से कहीं आगे
आकाश की परिधि से कहीं दूर
एक छोटा सा नाजुक सा ख्वाब
सहेज कर रखा है मैंने 
खुदा से भी छुपाकर !
रोज़ सँवारती हूँ उसे  
आहिस्ता-आहिस्ता
अपनी 'सोच' के आँचल में
कल्पना की सीपियों से!

पता है
रोज़ सवेरे-सवेरे 
सूरज की पहली किरण से पहले 
ये ख्वाब
नींदों में आ जाता है
और 'दिन'
अच्छा गुजर जाता है !
हकीकत और ख्वाब का 
ये साँझा रिश्ता देख
'जिंदगी' भी हौले से
मुस्कुरा देती है!
(शायद मेरी मासूमियत पर!)
  
काश की कुछएक ऐसे ही ख्वाब 
कभी सच ना हों 
और खूबसूरती-ऐ-जिंदगानी 
यूँही बनी रहे!

~Saumya

Thursday, January 27, 2011

सपना तुम्हारा...... जो सच हो जाएगा....



















स्पर्श तुम्हारा...जब उसे...छूकर निकल जाएगा,
फ़ीका नीला आसमां वो .......सतरंगी हो जाएगा 
तुम्हारी परछाईं की ओट में आकर 
धूमिल सा तारा वो...और दमक जाएगा!

काबिलियत तुम्हारी जब तुम्हें....कामयाबी दे जायेगी 
भीगी भीगी पलकों में.....ज़िन्दगी मुस्कुरायेगी!
तुम्हारी नज़रों की छाँव तले आकर
तिनका तिनका ये धरती.... और संवर जायेगी!

खुश होकर जब तुम....गीत कोई गुनगुनाओगी 
फिजाओं को भी संग अपने...... थिरकता हुआ पाओगी
तुम्हारी साँसों के तार जो यूँ  छिङ जायेंगे
ये गुल ये गुलशन...... और महक जायेंगे !


सपना तुम्हारा...... जो सच हो जाएगा
खुदा को भी खुद पर..... फक्र हो जाएगा 
तुम्हे यूँ हँसता- मुस्कुराता देख 
ये वक़्त भी कुछ देर......यूँही ठहर जाएगा !

सुनो.....वो जो दुआओं की पोटली है....उसे संभाल कर रखना
तुम अपनी मेहनत और लगन को.... बना कर रखना
हर सपना तुम्हारे सपने की ही इबादत करता है
सुनो...तुम बस उम्मीद की लौ....जला कर रखना !


Saumya

Tuesday, October 12, 2010

टूटे ख़्वाब....


हर शाम छत पर
जब अश्कों की आँच में
टूटे ख़्वाबों को
जलाती है वो 
तो धधकने लगती है
ख्वाहिशों की लौ!

सिहरती हवाओं का इक हुजूम
उड़ा ले जाता है संग
चंद अंगारों को
और फेंक देता है
किसी आसमां के सीने पर!

बच्चे खुश होते हैं
उन 'तारों' को देखकर
मुसाफिरों को मंजिल मिल जाती है
स्याह 'रात' जगमगा उठती है
और लोग
उन दम तोड़ते सुलगते अरमानों से भी
मन्नते मांग लेते हैं !

किसी को किसी के अंधियारों से
क्या फर्क पड़ता है ..............!!

~Saumya

Tuesday, December 15, 2009

ख्वाहिश ...


 
आसमां में उड़ने की ख्वाहिश  नहीं हमारी ,
हमें  बगिया  में  टहलना  ज्यादा  भाता  है ,
फूलों  से   जब  हम  सजाते  हैं  इसको  ,
आसमां भी दो गज, नीचे उतर आता है |

                                                                                                       ~सौम्या