Thursday, July 12, 2012

बूंदों की बारात ...















अभी थोड़ी देर पहले
दूर बादलों के गाँव से
छोटी-छोटी मनचली
बूंदों की बारात
आई थी मेरे शहर में
पाँवों में घुंघरू थे जो
रिमझिम-रिमझिम बजते थे
सिर पर ओढ़नी थी
मखमली फिजाओं की
रोम-रोम खिला सा था
हर मोती निरा सा था
निमंत्रण भेजा था मैंने परिंदों के हाथ
बूँदें आयीं थीं सज-सँवर के इस बार
अभी थोड़ी देर पहले ………………!

बोगनविलीया की छरहरी
नाज़ुक पंखुड़ियां
भीगी भीगी सी
अभी भी शर्मा रही हैं 
हवाओं के तौलिये से हौले हौले 
जुल्फें अपनी सुखा रही हैं …...............!

और वो सामने वाला

फुर्तीला …..अमरुद का पेड़
अपनी टहनियां आकाश में
ऐसे लहरा रहा है
मानो वो जो बगल वाली
फूलों की बेला है
उसे ही चुपके चुपके रिझा रहा है ………!

परिंदों की इक टोली
मेरी छत के ऊपर वाले आसमान में
प्रेम राग गा रही है
और तितलियों की इक मण्डली यहाँ नीचे
आहिस्ता आहिस्ता  गुनगुना रही है...........!

और वहां दूर वो बेहया
आवारा चाँद का टुकड़ा
बादलों की ओट से कैसे झाँक रहा है
नहा धोकर सुनहरी पोशाक में अपनी
धरा को देख देख इठला रहा है ..................!

थोड़ी सकुचाई सी
थोड़ी इतराई सी
धरती ...की साँसों में ये जो
रूमानियत का इत्र है 
तिनका तिनका ये कायनात को 
महका रहा है..................................... !

~Saumya

Wednesday, June 13, 2012

आँखों से थोड़ी बारिश हो..











सूखे हुए बेजान ख्वाब सारे
दफन हैं रूह की..... कमज़ोर बुनियाद पर 
......................................................
आँखों से थोड़ी बारिश  हो
तो दिल को यकीं आये
कि पल्कों की डाली पर
इक नया ख्वाब 
फिर 'हरा' होगा कभी.....................

~Saumya

Sunday, June 10, 2012

ये ज़िन्दगी क्यूँ .…फिर भी अच्छी लगती है ?




बात  बात  पर  देखो  ना …हर  पल   झगड़ती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ .....…फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

कभी  बिना  गुनाह  किये  ही ..............…सज़ा  सुनाती  है 
  मासूम  किसी  गुड़िया को .......... बेवजह  रुलाती  है 
हर  साँस में  रूह ….......... कितनी  बार  बिलखती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ  ........…फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

कभी  सपने  दिखाकर …............सपने  तोड़  देती  है 
  हवाओं  का  रुख   ही............  उल्टा  मोड़  देती  है 
उठ  कर  गिरना .…कभी  गिर  कर  उठना….लुढ़कती -संभलती है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ  ……………..फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

जिसे  शिद्दत  से  चाहो ….........…वो  कहाँ  बक्श्ती है 
जो  दुआओं  में  मांगो  .........…वो  कहाँ  सुनती  है 
दिल  की  प्यारी  बातों को ......…ये  कहाँ  समझती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ ……………. फिर  भी  अच्छी  लगती  है ?

हँसाती  है.......रुलाती  है......बनाती  है.......मिटाती  है
सिखाती  है.........दुलराती  है.......गिराती  है.........भगाती  है
हाथ  की  रेखाओं  पर  बस..............चलती  जाती  है.....

इस  कोने  कभी.........कभी  उस  कोने  सिसकती  है 
ये  ज़िन्दगी  क्यूँ...............फिर  भी  अच्छी  लगती  है? 

~Saumya

Wednesday, June 6, 2012

मानो चाँद ना हो...














कल चाँद फलक पर पूरा था
वैसा ही ....छैल -छबीला आवारा 
पहले तो बादलों के परदे में छिप -छिप कर
तंग करता रहा मुझे
फिर थक कर आकर बैठ गया बेहया
खिड़की पर मेरी !

सारी रात 
बिना पलक झपकाय 
एकटक........निहारती रही उसे मैं 
मानो चाँद ना हो
तुम्हारी ही कोई पुरानी
मुस्कुराती हुई....तस्वीर हो....... :)

Sunday, June 3, 2012

जो कहना चाहा था ..........














साँसों  के  उलझे  धागों  को 
थोड़ा  सुलझाया 
जज्बातों  के  समुंदर  को 
थोड़ा  टटोला 
एहसांसों पर  पड़ी 
धूल की  परत  भी  साफ़  की
बिखरे हुए  अल्फाजों को 
इक्हठा  किया 
थोड़ा  इधर …थोडा  उधर  से 
सूखी  कलम   में 
नयी  स्याही  भी  डाली 
और  एक   कोरा  कागज़  लेकर 
बैठ  गयी ……एकांत  में 
अकेले ……………तारों  से  मुंह  मोड़के………………
घण्टों  बाद  एहसास  हुआ  ……
आँसू की  एक  बूँद  छलक  कर 
पन्ने  पर  कहीं  फ़ैल  गयी  थी 
और  जो  कहना  चाहा था 
वो  हमेशा  की  तरह ……..…दिल  में  ही  रह  गया  !

~Saumya

Monday, December 26, 2011

तुम और मैं














सिरफिरे बादल से तुम
आवारा…..आज़ाद…शिखर के नज़दीक……
आकाश के आँगन में उमड़ते-घुमड़ते
रंगों की नयी-नयी छठा बिखेरते ……….
धूप की तपिश में हर रोज़ निखरते
एकदम बच्चों जैसे….मासूम .....
चाँद -तारों संग लुका -छिपी खेलते
हवाओं संग होड़ लगाते
कभी परिंदों की टोलियों को कहानियाँ सुनाते
और कभी ना जाने कहाँ गुम हो जाते …………
पागल ….बिल्कुल पागल हो तुम !
उड़नखटोले पर अपने जब सैर पर निकलते हो
सज-सँवर के………नारंगी, कभी नीली , कभी बैंगनी पोशाकों में
कितना इतराते फिरते हो …..उफ़……..ये अदाएं तुम्हारी !
जब कभी नाराज़ होते हो ना …..तो तुम्हारे गुस्से की धमक
धडकनें बढ़ा देती है….सच्ची !
पर वादियों की गोद में सिर रखकर ….फुर्सत में कभी
जब खुशियों के छोटे छोटे मोती छलकाते हो
तो पूरी कायनात मानो जश्न में सराबोर हो जाती है
धरती सँवर जाती है ….नयी नवेली दुल्हन की तरह !
संगीत मीठे …रंग और गहरे हो जाते हैं
दिल के बंद किवाड़ आप ही खुल जाते हैं ……..
ना जाने क्या बात है तुममे ………..
परियों के सपनों से लगते हो
फिर भी अपने से लगते हो ……..

और बावली नदी सी मैं
कभी फूलों जैसी शांत ….
कभी तितलियों जैसी चँचल….
जड़ों से जुड़ी ......
सीमाओं में बंधी …
अपनी राहें खुद बनाती
झूमती …गाती ….बलखाती ….
बस बहती जाती …बहती जाती …!
रेशमी किरणों संग अठखेलियाँ करती
झुरमुठों में गुलशन संग घंटों बतियाती
कभी रेत के दानों पर कविता लिख आती
एकदम बच्चों जैसी….मासूम .....
कभी बेवजह ही जोर से खिलखिला कर हंस देती
कभी तारों- जड़ी ओढ़नी  पहन इतरा कर चल देती
और कभी तुम्हारे बारे में सोचते- सोचते
थोड़ा शर्माकर ...थोड़ा इठलाकर …खुद में सिमट जाती ….
कभी झील की सिलवटों सी सुलझी हुई सी
कभी अपनी ही लहरों में उलझी हुई सी
कभी  बिछड़े किनारों  को  जोड़ती  तो  कभी
अपनी  ही  गहराईयों  में  खोयी  हुई  सी ….
पता है अक्सर छिप-छिपाकर
वो चाँद का टुकड़ा...... मुझमे उतर आता है ……
फिर सारी रात हम तुम्हारी ही बातें करते हैं …..

कितने  अलग  से  हैं ना ….मैं  और  तुम …
फिर  भी  कितने  एक  जैसे ….तुम  और  मैं
अनजाने  हैं  एक  दूजे  से
मिलेंगे  अचानक.....  कहीं किसी  अनजाने  से  मोड़  पर
शायद  फूलों  की  उन्ही  वादियों  के  बीच
जहाँ  मिलता  है  एक  सिरफिरा  बदल ….एक  बावली  नदी  से ……
ज़िन्दगी  मसरूफ़   है  अभी  उस  राह  को  संवारने  में
ये  इंतज़ार  तब  तक  अच्छा  लगता  है ….
है  ना ……!

~Saumya

Friday, February 18, 2011

एक छोटा सा ख्वाब
















वक़्त की रफ़्तार से कहीं आगे
आकाश की परिधि से कहीं दूर
एक छोटा सा नाजुक सा ख्वाब
सहेज कर रखा है मैंने 
खुदा से भी छुपाकर !
रोज़ सँवारती हूँ उसे  
आहिस्ता-आहिस्ता
अपनी 'सोच' के आँचल में
कल्पना की सीपियों से!

पता है
रोज़ सवेरे-सवेरे 
सूरज की पहली किरण से पहले 
ये ख्वाब
नींदों में आ जाता है
और 'दिन'
अच्छा गुजर जाता है !
हकीकत और ख्वाब का 
ये साँझा रिश्ता देख
'जिंदगी' भी हौले से
मुस्कुरा देती है!
(शायद मेरी मासूमियत पर!)
  
काश की कुछएक ऐसे ही ख्वाब 
कभी सच ना हों 
और खूबसूरती-ऐ-जिंदगानी 
यूँही बनी रहे!

~Saumya