Monday, January 11, 2010

सहर

















धुंध का घूंघट उठाती
सांवली सी सहर
इठलाती ,मुस्कुराती,
और बादलों की ओट से झांकता
ठिठुरता,अलसाता सूरज.....|
अंगड़ाईयां लेते झील और पोखर
और उन पर मचलती किरणों संग
अठखेलियाँ करती
वादियों की परछाईयाँ .....|
फूलों से अलंकृत पीरोजी चोली
और गुलाबी हवाओं की रेशमी ओढ़नी में   
सँवरती  वसुंधरा.....
शर्माती,सिहरती .....
खुद में सिमटती जाती ....|
साँसों में जब घुलती
हरसिंगार की महक
तो मानो ज़िन्दगी को जीने की
एक और वजह मिल जाती |
पतझड़ के शुष्क पत्तों से
फिर उभरता संगीत
ठूंठे अमलतास पर
पुनः पाखियों के नव गीत |
सीतकारती बासंती बयार
जब मीठी सी गुनगुनी धुप में
उड़ा ले जाती संग धूलिकणों  को
तो सहसा दीख पड़ती
झुरमुठों से झांकती वल्लरियाँ ,
पत्थरों के अंतराल में अंकुरित 
कोपलों की लड़ियाँ |
और ओस की चंद बूंदों के संग
पंखुड़ियों के आँचल में सहेजी हुईं 
अश्रुओं की तमाम सीपियाँ
कुछ गगन की,कुछ धरा की ,कुछ मेरी
जो बरबस ही छलक आयीं थीं
जीवन को फिर पनपता  देख.............|

~Saumya

Friday, December 18, 2009

नसीब ...













उन्सठ साल पुरानी चप्पलें
आज फिर काम पर जा रही हैं
घिस कर हो चुकी हैं कागज़ सरीखी
पर लिहाज़ करती हैं 'पहनने वाले का' |

पिताजी ने आज तय किया है
दो रोज़ दोपहर का खाना नहीं खायेंगे
चालीस रूपए कम हैं
बिटिया को जन्मदिन पर साइकिल दिलानी है |

माँ ने आज हलवा बनाया था
सबका हिस्सा लगाया
उसके हिस्से सिर्फ सौंधी खुशबू ही आ पाई
वो फिर खुद को गिनना भूल गयी थी |

दादी को आज पेंशन मिली थी
पोते को दे दी - कपडे बनवाने को
आधे दादी की दवाई में खर्च हो गए
बाकी में जीजी की ओढनी ही आ पाई|

आज छप्पर पर सावन भी जमकर थिरका
वो बेतरतीब बस्ती फिर बेदाग़  हो गयी
मुन्ना की पतंग देखो आसमां छु रही है
वो इन्द्रधनुष कैसा फीका जान पड़ता है |


इस बस्ती में मकान कच्चे पर दिल सच्चे हुआ करते हैं
बड़े तो बड़े ,बच्चे भी 'बड़े' हुआ करते हैं
दिन की आखिरी धुप भी जब दरवाज़े पर दस्तक देती  है
उसकी खुशामदीद में 'दिए' जला करते हैं |

सच कहूं तो इन ज़मीन पर सोने वालों के सपने
बिस्तर पर करवट बदलने वालों से
जियादा खूबसूरत होते हैं
पर तमन्नाएं हैं की नसीब का लिहाज़ कर जाती हैं.......


~सौम्या

Tuesday, December 15, 2009

ख्वाहिश ...


 
आसमां में उड़ने की ख्वाहिश  नहीं हमारी ,
हमें  बगिया  में  टहलना  ज्यादा  भाता  है ,
फूलों  से   जब  हम  सजाते  हैं  इसको  ,
आसमां भी दो गज, नीचे उतर आता है |

                                                                                                       ~सौम्या

Friday, December 11, 2009

कविता.........















कविता  वो नहीं
जो  मैं  संवेगहीन  स्याही की रिक्तता  में  घोल देती हूँ
और किसी सीले हुए से  कोरे कागज़  पर  उकेर  देती  हूँ
उसका आवेग तो शब्दों के छिछले सागर तक  ही गहरा होता है,
हर आवेश में ज़माने के दस्तूरों का पहरा होता है |
कविता  तो  वो  है
जो  मैं  मन  ही  मन  बुदबुदाती  हूँ
जो रिसती  है मेरी रगों में,
मेरी  सांसों  के  तार  जोड़ती है
मुझसे  मुझको  मिलवाती  है ….
लोग  कहते  हैं  मैं  बोलती  कम  हूँ ….
कैसे  कहूँ  ये  कविता हर  पल  मुझसे  बतियाती  है|
डरती  हूँ ………….
कि जब  ये  शरीर  जलेगा ..
तो  मेरी  राख  पर
हर  अनकही  नज्म
उभर  ना  आये
परत ………….
दर   परत  ……...
दर परत ……...
और  अश्कों  का  सैलाब  इस  कदर  ना  उमड़ने  लगे
कि  जो  ना  मायूस  थे  मेरे  जाने  पर ,वो  भी  बिलखने  लगें
इक  ओर  मेरी  रूह  को  दुआएं  नसीब  हों ………..
दूजी  ओर  मेरी  राख  को  साहूकार  मिलने  लगें ……
मोहसिन  हमारी  राख  को तुम  तोलना  ज़रूर
हम  जानना   चाहेंगे   हमारे  ग़मों  का  बोझ  कितना  था ………….


 ~सौम्या

Wednesday, November 4, 2009

बदलाव.....















एक  नन्ही  सी  बूँद
जो  उठी  थी  उर  से
अथाह  सागर के ,
का  स्वाद  चखा  था  मैंने 
तनिक  नमकीन  थी|
उड़  चली थी 
कुछ  सहमी  हुई  सी ,
कुछ  बहकी  हुई  सी ,
सूरज  के  प्यासे  अधरों   से
अपनी  नमी  छिपाती हुई ,
मलिन हुई  फिजाओं  से
अपनी  निवेदिता  बचाती हुई ,
तलाश  रही  थी 
अपना  खोया  अस्तित्व |
देखो  गगन  को  छूकर
उसके  गलियारों   में  रंग  भरकर
फिर  वापस  आई  है......
तृषित कंठों   को  तर  करने ,
बंजर  धरा  की गोद  भरने ,
हथेलियों  पर   मृदंग  करती ,
संग  पर  नए  छंद लिखती |
फिर  चखा  स्वाद  मैंने …….
और  आश्चर्य  हुआ  इस  नयी  अनुभूति  पर
की  बूँद  अब  मीठी हो  चुकी  थी |


बदलता  तो  है  मनुज  भी
शिखर को  छूकर
फिर  बदलाव  मनुज  में  ही क्यूँ
विपरीत  होता  है …………………


~सौम्या 


Friday, October 23, 2009

गरबीली गरीबी.................





लबे सड़क पर सजती है
गरबीली गरीबी की                                          
एक कराहती हुई तस्वीर
अपनी किस्मत पर बिलखती
एक फूटी हुई तकदीर .........

छप्परों पर यहाँ सावन नहीं थिरकते ,
ना ही गुज़रती है वो बावली बयार ,
दिन का सूरज तो कभी था ही नहीं इनका ,
चांदनी ले जाती है इनसे अँधेरे उधार.

ज़िन्दगी यहाँ इम्तेहां नहीं लेती..
इम्तेहां ही ज़िन्दगी ले लेते हैं
पलकें कभी ख्वाब नहीं पिरोतीं 
हकीकत छीन लेती है ये हक ......
दीख पड़ती है तो बडों की आँखों में तैरती बेबसी ,
छोटों की आँखों में सिसकते सवाल ...............

ठंडी पड़ी अंगीठी कि राख 
सुलगा देती है ग़मों की आंच को,
उबाल देती है अश्कों के सैलाब को                                                 
कि आतें कुम्हला जाती होंगी...
पेट में भड़की आग से................

यहाँ  तार सांसों के तब जुड़ते हैं ,
जब कूडों में से निवाले मिलते हैं                                                    
ये तिनका-तिनका मरते हैं,
तब ज़र्रा -ज़र्रा जीते हैं............

फिर भी तुम  नज़रें फेर लेते हो....                                             
आह! रूह छलनी हो जाती होगी
तुम्हारी उदासीनता दिल को 
चूर चूर कर जाती होगी ............

ये दर्द तो फिर भी सह लेते होंगे 
अपनी किस्मत पर रो लेते होंगे 
पर रूखी सूखी रोटी जब दिन बाद,
हलक के पार उतरती होगी,
हाय कुम्हलाई आतों को,
किस कदर न जाने चुभती होगी......
किस कदर न जाने चुभती होगी......

पर तंज़ ये नहीं है                                                                     
कि ये तस्वीर नाखुश  है 
तंज़ ये है
कि ऐसी ही तस्वीर तुम 
कागज़ पर उतारते हो 
फिर कीमत चुकाकर 
घरों में सजाते हो.......
खुशकिस्मत है ये तस्वीर 
जिसे सिरजनहार मिला ,
बदकिस्मत थी वो..........
जिसे कोई न पालनहार मिला......
कोई ना पालनहार मिला............
कोई ना ................................

~सौम्या 

Sunday, October 4, 2009

मायूसी...........
















 



आज  फलक के उस पार जाने की तमन्ना हुई ,
कि  आज वक़्त से होड़ लगाने की तमन्ना हुई.


मुस्कुराते-मुस्कुराते ज़ख्मी हो चुके हैं होंठ,
कि आज खुल-कर खिलखिलाने की तमना हुई.


लफ्ज़ भी कतराने लगे हैं अब लबों पर आने से,
कि आज अपनी खामोशी को गुनगुनाने की तमन्ना हुई.


इस कदर डर गयी हूँ हर शख्स से यहाँ पर,
कि आज अपने ही साए को मिटाने की तमन्ना हुई.


संजो रही हैं मेरी आँखें जो सैलाब ज़माने से,
आज ज़माने को उस समंदर में डुबाने की तमन्ना हुई.


हर मोड़ पर मिल जाते हैं अदाकार यहाँ,
कि आज हर चेहरे से नकाब हटाने की तमन्ना हुई.


धधक रहा है शहर खुद की लगाईं आग में,
कि आज राख के बने ढेर को फिर जलाने की तमन्ना हुई.


आजिज़ है मन कुछ उलझे हुए सवालों से,
कि आज खुदा से हर जवाब माँगने की तमन्ना हुई.


कब तलक घुल पाएगी ये मायूसी इस स्याही में,
कि आज अपनी कलम को फिर आजमाने की तमन्ना हुई.


~ सौम्या