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Sunday, October 4, 2009

मायूसी...........
















 



आज  फलक के उस पार जाने की तमन्ना हुई ,
कि  आज वक़्त से होड़ लगाने की तमन्ना हुई.


मुस्कुराते-मुस्कुराते ज़ख्मी हो चुके हैं होंठ,
कि आज खुल-कर खिलखिलाने की तमना हुई.


लफ्ज़ भी कतराने लगे हैं अब लबों पर आने से,
कि आज अपनी खामोशी को गुनगुनाने की तमन्ना हुई.


इस कदर डर गयी हूँ हर शख्स से यहाँ पर,
कि आज अपने ही साए को मिटाने की तमन्ना हुई.


संजो रही हैं मेरी आँखें जो सैलाब ज़माने से,
आज ज़माने को उस समंदर में डुबाने की तमन्ना हुई.


हर मोड़ पर मिल जाते हैं अदाकार यहाँ,
कि आज हर चेहरे से नकाब हटाने की तमन्ना हुई.


धधक रहा है शहर खुद की लगाईं आग में,
कि आज राख के बने ढेर को फिर जलाने की तमन्ना हुई.


आजिज़ है मन कुछ उलझे हुए सवालों से,
कि आज खुदा से हर जवाब माँगने की तमन्ना हुई.


कब तलक घुल पाएगी ये मायूसी इस स्याही में,
कि आज अपनी कलम को फिर आजमाने की तमन्ना हुई.


~ सौम्या