Monday, January 11, 2010

सहर

















धुंध का घूंघट उठाती
सांवली सी सहर
इठलाती ,मुस्कुराती,
और बादलों की ओट से झांकता
ठिठुरता,अलसाता सूरज.....|
अंगड़ाईयां लेते झील और पोखर
और उन पर मचलती किरणों संग
अठखेलियाँ करती
वादियों की परछाईयाँ .....|
फूलों से अलंकृत पीरोजी चोली
और गुलाबी हवाओं की रेशमी ओढ़नी में   
सँवरती  वसुंधरा.....
शर्माती,सिहरती .....
खुद में सिमटती जाती ....|
साँसों में जब घुलती
हरसिंगार की महक
तो मानो ज़िन्दगी को जीने की
एक और वजह मिल जाती |
पतझड़ के शुष्क पत्तों से
फिर उभरता संगीत
ठूंठे अमलतास पर
पुनः पाखियों के नव गीत |
सीतकारती बासंती बयार
जब मीठी सी गुनगुनी धुप में
उड़ा ले जाती संग धूलिकणों  को
तो सहसा दीख पड़ती
झुरमुठों से झांकती वल्लरियाँ ,
पत्थरों के अंतराल में अंकुरित 
कोपलों की लड़ियाँ |
और ओस की चंद बूंदों के संग
पंखुड़ियों के आँचल में सहेजी हुईं 
अश्रुओं की तमाम सीपियाँ
कुछ गगन की,कुछ धरा की ,कुछ मेरी
जो बरबस ही छलक आयीं थीं
जीवन को फिर पनपता  देख.............|

~Saumya

18 comments:

  1. kya baat hai ..... mahan kawiyatri ki jhalak milti hai..

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  2. har kisi koa aisi nazar naseeb nahi hoti jo itna kuch dekhti hai!
    gr88 thoughts!
    once again ..superb!:)

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  3. thank you ananya,lucky n maverick for the read and appreciating it...

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  4. awesom poetry ....really ,mujhe vo kahavat yaad aa gayi..jahan na pahunche ravi vahan pahunche kavi....:)behad khoobsoorat kavita hai ..hatts off

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  5. nice piece buddy...
    plz chk out if its firozi rather than piroji in 10th line....

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  6. thank you vandana ...
    thanks shivam....i checked...its pirozi only...

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  7. i was mesmerized...i never knew this saumya....amazing beauty yaar...must say...very mature thought...excellent work.keep it up.

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  8. thankyou so much prateek for the read......and appreciating it so much.....

    thank you saurabh...

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  9. nice poem....... good combination of word-hindi n urdu.....

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  10. कविता से निकलती आवाज.....
    मध्यम-मध्यम
    पर सुन्दर....

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  11. nice poem....... good combination of word-hindi

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  12. आप बहुत ही अच्छा लिखती हैं...लिखते रहिये....बहुत ही अच्छी प्रस्तुति...दिल खुश हो गया पढ़ के

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  13. ज़िन्दगी को जब भी कोई एक अनोखे अंदाज मे देखता है तो बहुत सकूँ मिलाता पढ़कर.
    दर्द पर मरहम लगजाता. कुछ ऐसा ही आपकी रचनाओं में...



    कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
    http://qatraqatra.yatishjain.com/

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Thankyou for reading...:)