
कविता वो नहीं
जो मैं संवेगहीन स्याही की रिक्तता में घोल देती हूँ
और किसी सीले हुए से कोरे कागज़ पर उकेर देती हूँ
उसका आवेग तो शब्दों के छिछले सागर तक ही गहरा होता है,
हर आवेश में ज़माने के दस्तूरों का पहरा होता है |
कविता तो वो है
जो मैं मन ही मन बुदबुदाती हूँ
जो रिसती है मेरी रगों में,
मेरी सांसों के तार जोड़ती है
मुझसे मुझको मिलवाती है ….
लोग कहते हैं मैं बोलती कम हूँ ….
कैसे कहूँ ये कविता हर पल मुझसे बतियाती है|
डरती हूँ ………….
कि जब ये शरीर जलेगा ..
तो मेरी राख पर
हर अनकही नज्म
उभर ना आये
परत ………….
दर परत ……...
दर परत ……...
और अश्कों का सैलाब इस कदर ना उमड़ने लगे
कि जो ना मायूस थे मेरे जाने पर ,वो भी बिलखने लगें
इक ओर मेरी रूह को दुआएं नसीब हों ………..
दूजी ओर मेरी राख को साहूकार मिलने लगें ……
मोहसिन हमारी राख को तुम तोलना ज़रूर
हम जानना चाहेंगे हमारे ग़मों का बोझ कितना था ………….~सौम्या








