Wednesday, June 6, 2012

मानो चाँद ना हो...














कल चाँद फलक पर पूरा था
वैसा ही ....छैल -छबीला आवारा 
पहले तो बादलों के परदे में छिप -छिप कर
तंग करता रहा मुझे
फिर थक कर आकर बैठ गया बेहया
खिड़की पर मेरी !

सारी रात 
बिना पलक झपकाय 
एकटक........निहारती रही उसे मैं 
मानो चाँद ना हो
तुम्हारी ही कोई पुरानी
मुस्कुराती हुई....तस्वीर हो....... :)

17 comments:

  1. या शायद, आइना हो, जो भविष्य वाला कल बतलाता हो?


    Cheers,
    Blasphemous Aesthete

    ReplyDelete
  2. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति..

    ReplyDelete
  3. तुम्हारी ही कोई पुरानी
    मुस्कुराती हुई....तस्वीर हो....... :)
    .....हम्मम्मम बहुत कुछ कह दिया गया यहाँ तो....अब हम क्या कहें....!!

    ReplyDelete
  4. तुम्हारी ही कोई पुरानी
    मुस्कुराती हुई....तस्वीर हो....... :)
    .....हम्मम्मम बहुत कुछ कह दिया गया यहाँ तो....अब हम क्या कहें....!!

    ReplyDelete
  5. @Virendra ji: thankyou :)

    @Anshul: May be :)

    @Sanjay Bhaskar: thankyou :)

    @Shekhar Suman: thanks :)

    ReplyDelete
  6. @Rahul ranjan: thanks a lot :)

    ReplyDelete
  7. बहुत खूब .. चाँद में अक्सर उनकी तस्वीर का नज़र आना ... प्रेम की शुरुआत ही तो है ...

    ReplyDelete
  8. chaand ko chaand hi rahne do koi naam na do :P ......hehe cute njm hai :)

    ReplyDelete
  9. gulzar shaab wala andaaz hai! Badhiya!

    ReplyDelete
  10. The last two lines epitomized everything. Lovely :)

    ReplyDelete

Thankyou for reading...:)